जिन बायर्स ने 2012-13 में फ्लैट बुक करबाए थे, वह आज भी पजेशन मिलने की बाट जोह रहे हैं। हालांकि, अब नए और अर्धनिर्मित प्रॉजेक्ट्स रेरा के तहत लाए जाने हैं। इसके लिए राज्यों की रेरा अथॉरिटीज को कड़ा रुख अपनाना होगा और एक भी प्रॉजेक्ट को इसके दायरे से बाहर नहीं छोड़ना होगा।

रियल एस्टेट (रेग्युलेशन ऐंड डिवेलपमेंट) एक्ट, 2016 यानी रेरा के लागू हुए एक साल हो गया है। हालांकि, इस कानून की कुछ धाराओं को 1 मई, 2016 को ही लागू कर दिया गया, लेकिन पूरा कानून 1 मई, 2017 को लागू हुआ था। रेरा से पहले देश में रियल एस्टेट सेक्टर की कोई नियामक संस्था नहीं थी। इसका नाजायज फायदा उठाकर बिल्डरों ने घर खरीदारों (होम बायर्स) को बहुत परेशान किया।
ज्यादातर बिल्डर्स कभी वक्त पर प्रॉजेक्ट्स पूरा नहीं करते और होम बायर्स पैसे देकर भी दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर रहते।
रियल एस्टेट सेक्टर में ऐसी ही घोर अनियमितताओं को खत्म करने के लिए रेरा का निर्माण हुआ और इसे लागू किया गया। साथ ही, इसका मकसद सुधारों के जरिए रियल एस्टेट सेक्टर को तेज रफ्तार प्रदान करना भी है। लेकिन, क्या रेरा अपने इन मकसदों में खरा उतर पा रहा है? इस सवाल का जवाब रियल एस्टेट कंसल्टंसी फर्म नाइट फ्रैंक इंडिया की ओर से जारी बयान में मिलता है। इसमें कहा गया है, ‘देशभर में रेरा लागू करने की दिशा में हुई प्रगति की तस्वीर अब भी धुंधली है। पहली वर्षगांठ पर विभिन्न राज्यों में कार्यान्वयन के लिहाज से यह लक्ष्य के आसपास भी नहीं पहुंचा है।’
रेरा से पहले ज्यादातर बिल्डर्स होम बायर्स को हल्के में लेते थे। कई शहरों में रियल एस्टेट प्रॉजेक्ट्स की लेटलतीफी आम हो चुकी थी। स्थिति ऐसी है कि जिन बायर्स ने 2012-13 में फ्लैट बुक कवराए थे, वह आज भी पजेशन मिलने की बाट जोह रहे हैं। हालांकि, अब नए और अर्धनिर्मित प्रॉजेक्ट्स रेरा के तहत लाए जाने हैं। इसके लिए राज्यों की रेरा अथॉरिटीज को कड़ा रुख अपनाना होगा और एक भी प्रॉजेक्ट को इसके दायरे से बाहर नहीं छोड़ना होगा। हाल ही में हरियाणा रियल एस्टेट रेग्युलेटरी अथॉरिटी ने बन रहे प्रॉजेक्ट को रेरा में रजिस्टर नहीं करवाने पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। एक बार प्रॉजेक्ट रजिस्टर हो जाने के बाद होम बायर्स को वक्त पर पजेशन पाने के लिए बिल्डर से लड़ने की ताकत मिल जाती है।
हालांकि, कुछ राज्यों में यह मामला नहीं है। कई राज्यों ने ‘जारी परियोजना (ऑनगोइंग प्रॉजेक्ट)’ की परिभाषा बदल दी जिससे कई प्रॉजेक्ट्स रेरा के दायरे में आ ही नहीं पाए। दुर्भाग्यवश, इस वजह से होम बायर्स को अब भी बिल्डरों की मनमानी से छुटकारा नहीं मिल पाया है। इनमें कई लंबे समय से फ्लैट नहीं मिलने तो कई वादे के मुकाबले बहुत घटिया किस्म के घर दिए जाने से परेशान हैं।